
ईश्वर ने इस जहां के हर इन्सान को अपने हाथों से बनाया है यह तो जग जाहिर है लेकिन कुछ लोगों को ईश्वर बड़ी फूर्सत से बनाहै और उनमें अपना अंश भी रखता है ताकि वह जग पर जाकर आम जन की समस्याओं का समाधान कर सके। बांसवाड़ा के पंण्डित महादेव शुक्ल भी ऐसी ही शख्सियतों में से एक है।
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल की स्मृति में श्रद्धान्जलि सभा में उमड़ा श्रद्धा का ज्वार
बांसवाड़ा में पीताम्बरा शक्तिपीठ स्थापना होगी
धर्म-संस्कृति व अध्यात्म क्षेत्र में रचनात्मक अभियान चलाने का संकल्प
बांसवाड़ा, १६ मार्च/जाने-माने अध्यात्म चिन्तक और प्राच्यविद्यामनीषी देवर्षि पं. महादेव शुक्ल की स्मृति में सोमवार को बांसवाड़ा के औदीच्यवाड़ा स्थित सेठ साँवरिया धर्मशाला में विभिन्न संस्थाओं, समाजों और बुद्धिजीवियों की ओर से आयोजित श्रद्धान्जलि सभा में पं. शुक्ल के शिष्यों और वागड़, कांठल एवं मेवाड़ के प्रबुद्धजनों ने भावभीनी श्रद्धान्जलि अर्पित की और पं. शुक्ल के अधूरे कार्यों को पूर्ण करने के लिए तन-मन-धन से जुटने का संकल्प ग्रहण किया।
श्रद्धान्जलि सभा में उपस्थित संभागियों ने पं. शुक्ल की तस्वीर पर पुष्प अर्पित किए और अपनी ओर से भावपूर्ण पुष्पान्जलि दी। सभा की शुरूआत ब्रह्मर्षि पं. भालचन्द्र शुक्ल के आचार्यत्व में पण्डितों के समूह द्वारा वैदिक मंगलाचरण एवं पुण्याहवाचन से हुई। इसमें वेद विद्वानों पं. श्री हरि शुक्ल(प्रतापगढ़), पं. हर्षदराय नागर, पं. इन्द्रशंकर झा तथा पं. जयनारायण पण्ड्या, पं. राजेश त्रिवेदी, पं. विनय भट्ट, पं. मनोज रावल, पं. चन्द्रकान्त मेहता, पं. प्रदीप भट्ट, आदि ने विभिन्न वेदों की ऋचाओं का सस्वर गान किया और भद्र सूक्त का पठन किया।
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के समग्र जीवन आयामों पर साहित्यकार श्री प्रकाश पण्ड्या ने पत्रवाचन किया और पं. शुक्ल के व्यक्तित्व एवं कर्मयोग के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला।
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के संकल्पों के अनुसार गायत्री मण्डल की
भावी योजनाओं पर पं. लोकेन्द्र भट्ट ने जानकारी दी और बताया कि गायत्री मण्डल परिसर में देवी बगलामुखी एवं मृत्युन्जय महादेव मन्दिर के साथ पीताम्बरा शक्तिपीठ स्थापित करने,, संदर्भ पुस्तकालय एवं गौशाला संचालन, पौरोहित्य एवं ज्योतिष प्रशिक्षण शिविर, पं. शुक्ल की स्मृति में पुरस्कार एवं सम्मान स्थापित करने आदि योजनाओं के बारे में जानकारी दी।
सभा में सभी वक्ताओं ने देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के निधन को अपूरणीय क्षति बताया और कहा कि उनके संकल्पों को साकार करने के लिए समूचा समाज, सभी रचनात्मक संस्थाएं और प्रबुद्धजन तथा भामाशाह कृत संकल्पित हैं और इसके लिए हरसंभव कोशिशें की जाएंगी। इसके लिए सभी स्तरों पर प्रयास किया जाएगा। सभी वक्ताओं ने कहा कि पं. शुक्ल ने अपनी विद्या और साधनाओं के बल पर देश भर में वागड़ अंचल को गौरवान्वित किया है। उनकी स्थापित परम्पराओं और आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए समर्पित प्रयास होंगे।
सभा में समाजसेवी दिनेश जोशी ने स्वर्गीय हरिदेव जोशी व पं. महादेव शुक्ल के सघन आत्मीय रिश्तों का जिक्र किया और कहा कि पं. शुक्ल के कार्यों को योजनाबद्ध स्वरूप दिए जाने के लिए ठोस प्रयास होंगे।
जाने-माने ज्योतिर्विद, राजस्थान ब्राह्मण महासभा के प्रदेश उपाध्यक्ष पं. लक्ष्मीनारायण द्विवेदी ने युगपुरुष पं. शुक्ल के राष्ट्रीय व्यक्तित्व का स्मरण किया। सभा में प्रसिद्ध अभिभाषक लक्ष्मीकान्त त्रिवेदी, समाजसेवी झुमकलाल तेली, श्रीमद् भागवत समिति के अध्यक्ष शंकरलाल दोसी, साहित्यकार भूपेन्द्र तनिक, पीताम्बरा परिषद के अध्यक्ष पं. दिनेश भट्ट आदि ने विचार रखे और पं. शुक्ल के कार्यों को पूर्ण करने के लिए सभी संस्थाओं और समाजों की भागीदारी का आश्वासन दिया।
मुम्बई के साहित्यकार पं. मोहन जोशी ने पं. महादेव शुक्ल पर सुमधुर कविता प्रस्तुत की। श्रद्धान्जलि सभा का संचालन दीपक द्विवेदी ने किया।
इस अवसर पर देवर्षि पं. शुक्ल को श्रद्धान्जलि अर्पित करने वालों में घाटोल के उपखण्ड अधिकारी भवानीसिंह पालावत, पं. धरणीधर शास्त्री, ब्राह्मण महासभा के जिलाध्यक्ष चन्दूलाल उपाध्याय, डॉ. नर्मदाशंकर रणा आदि विशिष्टजन प्रमुख हैं। कई अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों, समाजसेवियों और समाजों के प्रतिनिधियों ने पुष्पान्जलि अर्पित की।
गायत्री मण्डल के लिए दो लाख के सहयोग की घोषणा
श्रद्धान्जलि सभा में देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के शिष्यों और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों तथा बुद्धिजीवियों ने गायत्री मण्डल की गतिविधियों को सम्बल देने के लिए करीब दो लाख रुपए के सहयोग की घोषणा की। इनमें देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के पुत्र श्री कृष्णकान्त शुक्ल ने ५१ हजार रुपए देने की घोषणा की जबकि पीताम्बरा परिषद के संयोजक पं. दिनेश भट्ट तथा परिषद के सह संयोजक डॉ. दीपक आचार्य ने २५-२५ हजार रुपए भेंट करने की घोषणा की। इसी प्रकार राजस्थान ब्राह्मण महासभा की जिला इकाई तथा श्रीमद्भागवत समिति ने ५-५ हजार रुपए, पं. जयप्रकाश पण्ड्या ने ११ हजार रुपए दिए जाने की घोषणा की।
सभा में देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के शिष्यों दीपक द्विवेदी, एपीआरओ श्रीमती कल्पना, पं. राजेश त्रिवेदी, पं. जयनारायण पण्ड्या, नरेन्द्र आचार्य, प्रकाश पण्ड्या, पं. विनय भट्ट, बृजमोहन तूफान, कन्हैयालाल जोशी, विद्यासागर शुक्ल ने पांच-पांच हजार रुपए प्रदान किए जाने की घोषणा की। इसी प्रकार पीताम्बरा परिषद एवं गायत्री मण्डल के एक सौ से अधिक सदस्यों की ओर से एक-एक हजार रुपए की राशि आजीवन सदस्यता के लिए प्रदान करने की घोषणा की गई। सभा में जानकारी दी गई कि गायत्री मण्डल की ओर से मार्च माह में एक-एक हजार रुपए की राशि से पांच सौ आजीवन सदस्य बनाये जाएंगे। इस स्थायी कोष से गायत्री मण्डल की नियमित गतिविधियों का संचालन किया जाएगा।
धर्म-अध्यात्म के शिखर पुरुष देवर्षि पं. महादेव शुक्ल स्मृति ग्रंथ प्रकाशित होगा
संतों-महंतों और संस्थाओं ने दी भावपूर्ण श्रद्धान्जलि
श्रद्धान्जलि सभा सोमवार को सेठ सांवरिया औदीच्य धर्मशाला में
बांसवाडा, १५ मार्च/हिन्दुस्तान के वैदिक विद्वानों और प्राच्यविद्या जगत म मशहूर जानी-मानी हस्ती देवर्षि पं. महादेव शुक्ल को श्रद्धान्जलि देने के लिए १६ मार्च, सोमवार को प्रातः ९.३० बजे बांसवाड़ा के औदीच्यवाड़ा स्थित सेठ सांवरिया धर्मशाला में श्रद्धान्जलि सभा एवं भण्डारा का आयोजन किया जाएगा। इसमें देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के शिष्य, श्रीविद्या, गायत्री एवं पीताम्बरा के साधक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि और गणमान्य विद्वान हिस्सा लेंगे। इसमें पं. शुक्ल के व्यक्तित्व और कर्मयोग पर वक्ताओं की ओर से विचार रखे जाएंगे तथा पं. शुक्ल के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए कार्ययोजना व भावी कार्यक्रमों पर विचार किया जाएगा।
देवर्षि पर प्रकाशित होगा स्मृति ग्रंथ
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के व्यक्तित्व और दशकों तक की गई धर्म-अध्यात्म, संस्कृति और समाज की सेवा से भरे समग्र कर्मयोग को युगों तक चिरस्थायी बनाए रखने के लिए पीताम्बरा परिषद की ओर से बहुरंगी स्मृति ग्रंथ प्रकाशित किया जाएगा। इसमें. उनके व्यक्तित्व, कर्मयोग तथा जीवन पर आधारित आलेखों, छायाचित्रों आदि का समावेश होगा। ग्रंथ में पं. शुक्ल के बारे में देश के प्रसिद्ध संत-महात्माओं और विद्वजनों के आलेखों के साथ ही तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, प्राच्यविद्याओं, पीताम्बरा एवं श्रीविद्यासाधना तथा अन्य आध्यात्मिक विषयों पर संग्रहणीय सामग्री का समावेश किया जाएगा।
परिषद के अध्यक्ष दिनेश भट्ट ने बताया कि यह ग्रंथ प्रसिद्ध लेखक और देवर्षि के पट्ट शिष्य, बांसवाडा के जिला सूचना एवं जन सम्पर्क अधिकारी डॉ. दीपक आचार्य के संपादन म प्रकाशित किया जाएगा। भट्ट ने सभी विद्वानों और देवर्षि पं. शुक्ल के करीबी रहे गणमान्य व्यतियों से आग्रह किया है कि वे इसके लिए सामग्री भिजवाये।
श्रद्धान्जलि अनुष्ठान होगा
पीताम्बरा परिषद की ओर से मार्च के अंतिम सप्ताह म देवर्षि पं. महादेव शुक्ल की स्मृति म श्रद्धान्जलि अनुष्ठान का आयोजन होगा। इसम देवर्षि के सभी शिष्य और प्रशंसक हिस्सा लगे। इसके अन्तर्गत लघु रूद्र, पीताम्बरा और श्रीविद्या अनुष्ठान तथा वैदिक विधि विधान के अनुष्ठान होंगे। इसम पं. शुक्ल के अधूरे कार्यों को मूर्त्त रूप देने पर विचार किया जाएगा।
संत-महंतों ने कहा - अपूरणीय क्षति
देश के विभिन्न मठों और अखाडों के संत-महन्तों ने देवर्षि पं. महादेव शुल के निधन को धर्म-संस्कृति और अध्यात्म जगत के लिए महान क्षति बताया है और कहा है कि इस तरह का मनीषी युगों म पैदा होता है। राष्ट्रीय अनि अखाडा के महंत एवं श्रीरामबोला मठ डूंगरपुर के महंत केशवदास महाराज, बेणेश्वर पीठाधीश्वर गोस्वामी अच्युतानंद महाराज, महाकाल मठ के स्वामी रामानंद ब्रह्मचारी, गुरु आश्रम छींच के महंत घनश्यामदास महाराज, लालीवाव मठ के पीठाधीश्वर महंत हरिओमशरणदास, भारतमाता मन्दिर के महंत रामस्वरूप महाराज सहित कई संत-महंतों ने पं. महादेव शुक्ल के प्रति भावपूर्ण श्रद्धान्जलि अर्पित की है।
ज्योतिष परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रसिद्ध ज्योतिर्विद पं. बाबूलाल जोशी(रतलाम) ने देवर्षि के महाप्रयाण को उत्तर भारत के धर्म-अध्यात्म जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया है और कहा है कि जिन उंचाइयों के बूते उन्होंने लोढ़ी काशी को पूरे देश में गौरव प्रदान किया था, वह कर्मयोग का अनूठा उदाहरण है।
जीवनवृत्त
स्मृति शेष वेद मार्त्तण्ड युग पुरुष देवर्षि पं. महादेव शुक्ल
नई पीढ़ी को प्राच्यविद्याओं से रूबरू कराने वाले कालजयी भगीरथ
प्रस्तुति - डॉ. दीपक आचार्य
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ऋषि-मुनियों की प्राचीन तपोभूमि वाग्वर धरा रत्नगर्भा रही है। यह पुण्य भूमि आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक समृद्धि की सुरभि से सुधी जनों के हृदय को अनुप्राणित करती रही है। संत परम्परा का एक सुदृढ़ आधार रखने वाली इस पावन धरा ने अनेक श्रेष्ठ रत्नों को जन्म दिया है।
यहाँ के संतों में दुर्लभजी, भैरवानन्द, केशवाश्रम, भगवानदास, उदासी महाराज, गवरी बाई, बड़लिया वाले भोलानाथ महाराज, स्वामी रामानन्द सरस्वती, स्वामी स्वतंत्रतानंद महाराज आदि प्रमुख हैं। वहीं संस्कृत विद्वानों और वेदज्ञों की परम्परा में पं. रामचन्द्र जी, पं. पन्नालाल जोशी, पं. धनशंकर नागर, पं. भजामीशंकर, पं. शुभशंकर, पं. ललिताशंकर, डॉ. मनोहरलाल द्विवेदी, देवर्षि पं. महादेव शुक्ल आदि चर्चित रहे हैं।
जब कभी हिन्दुस्तान में वैदिक संस्कृति और पुरातन विधाओं का जिक्र आता है बांसवाड़ा का अहम स्थान होता है। वाग्वर का अर्थ है- वाक्+वर अर्थात वाणी में श्रेष्ठ। इस दृष्टि से विद्वानों और साधकों की अक्षुण्ण परम्परा यहां सदैव विद्यमान रही है। यहां के संस्कृतज्ञों एवं प्राच्यविद्या मर्मज्ञों की परम्परा में निष्काम कर्मयोगी वेद मार्त्तण्ड ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल का नाम बड़े ही आदर और गौरव के साथ लिया जाता है।
पुरातन कर्मकांड एवं प्राचीन विद्याओं से भरे पूरे इस अंचल में संतों-पंडितों ने इन विद्याओं को विज्ञान के साथ जोड़ कर जन-जन तक सरल एवं सहज ढंग से सम्प्रेषित किया और बताया कि यह विद्याएं मनुष्य की लोक कल्याणकारी सृजनशीलता का निस्सीम विस्तार कर सीमाओं के बंधन से मुक्त कराती है। मंत्र और तंत्र का उद्देश्य भी वही हैं। 'तनु विस्तारयते इति तंत्र'। पं. महादेव शुक्ल ने तंत्र के इसी स्वरूप को अपनाया। वैयक्तिक ऐषणाओं से परे रहने वाले पं. शुक्ल का समग्र जीवन त्याग का पर्याय रहा है।
आपका जन्म विक्रम संवत् १९७९ कार्तिक कृष्ण दशमी, तदनुसार १३ नवम्बर १९२२ को हुआ। उन्हें पौरोहित्य कर्म, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र एवं आध्यात्मिक संस्कार अपने पिता श्री शंकरलाल जी से मिले। पारिवारिक विरासत से प्राप्त संस्कारों को निरन्तर ज्ञानार्जन से परिपुष्ट किया पं. शुक्ल ने।
यह संयोग ही है कि पं. शुक्ल की साधना स्थली उनका निवास किसी समय बहुत बड़े तांत्रिकाचार्य की सिद्ध स्थली रहा है। इस बारे में कई रोचक घटनाएँ बहुश्रुत हैं। वे विद्वानों और सिद्ध संतों से संपर्क में रहे और अनेक सिद्धियां एवं मांत्रिक-तांत्रिक क्रियाएं प्राप्त कीं। उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा बांसवाड़ा में ही हुई। यहां उन्होंने हिन्दी एवं अंगे्रजी विषयों के साथ उच्च प्राथमिक स्तर की शिक्षा पायी।
सन् १९३६ में उन्होंने भगवान महाकाल की नगरी उज्जयिनी जाकर रामघाट स्थित बनारस संस्कृत कॉलेज से संबंधित हरनंदराय रूईया संस्कृत पाठशाला में प्रवेश लिया। यहाँ उन्होंने पं. श्रीधरजी शास्त्री से शिक्षा प्राप्त करते हुए सन् १९३७ में बंगाल एसोसिएशन, कलकत्ता से संस्कृत प्रथमा परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से व्याकरण प्रथमा की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् १९४० में काशी के संस्कृत विद्यालय से संस्कृत प्रथमा की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हीं दिनों आजादी के संघर्ष में भी उन्होंने हिस्सा लिया। शुक्ल यजुर्वेद के अध्ययन हेतु उन्हें पाठशाला से बाहर रहना पड़ा। इसलिए उन्होंने हरसिद्धि मन्दिर के पास श्री गणपतलाल जी वकील के मकान में कमरा लिया तथा श्री बसन्तीलालजी शुक्ल भागसीपुरा से यजुर्वेद व साहित्य की पढ़ाई की। इसके साथ ही कर्मकाण्ड भी सीखते रहे। वे श्री ओंकार जी महाराज से भी पढ़ते रहे। श्री् संकर्षण व्यास जी से सामान्य ज्योतिष व कुण्ड सिद्धि आदि की पढ़ाई की।
संस्कृत भाषा के अध्ययन के पश्चात उज्जैन के राजकीय संस्कृत विद्यालय, महाकालेश्वर में वेद अध्ययन किया और अनवरत अध्ययनकर शुक्ल यजुर्वेद में पारंगत हुए। सन् १९५३ में बनारस संस्कृत कॉलेज के इन्दौर केन्द्र से प्रवेश पाकर राजकीय संस्कृत विद्यालय बनारस से शुक्ल यजुर्वेद मध्यमा परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। इस बीच स्वतन्त्रता आन्दोलन में हिन्दू महासभा का भी प्रचार किया
संस्कृत और वेद का अध्ययन पूरा कर पंडित शुक्ल ने अपना सारा जीवन वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में समर्पित कर दिया। सन् १९५४ में गुजरात में बड़ोदरा जिले में नर्मदा किनारे वेद प्रचारार्थ कोरल गांव में आशापुरी माता मन्दिर में पाँच साल तक रहे वेद पाठशाला स्थापित की। इसमें आरंभ में दस छात्रों से वेद कक्षा शुरू कर वैदिक प्रचार किया। सन् १९६३ में भी कोरल गांव में ब्राह्मण समाज को एकत्रित कर २४ लाख गायत्री जप का पुरश्चरण व पंचकुण्डी गायत्री यज्ञ सम्पन्न करवाया। इसके पश्चात् कुछ वर्ष नारेश्वर श्री रंग अवधूत के आश्रम में निवास किया व वहां पर भी वेदाध्ययन करवाते रहे। इसी दौरान् अनेक बालकों को कर्मकाण्ड सिखाया।
बहिर्मुखी स्वभाव से काफी दूर पं. शुक्ल सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना से निर्लिप्त रहकर सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों के संचालन में ताजिन्दगी अहम भूमिका निभाते रहे।
सन् १९५६ में अष्टग्रही योग के मद्देनज़र विश्वशान्ति के उद्देश्य से श्रावण मास में वेद प्रचार के उद्देश्य से समस्त ब्राह्मण समाज को एकत्रित कर वनेश्वर शिवालय में २४ लाख गायत्री जप (पुरश्चरण) सम्पन्न करवाया। क्षेत्र में किसी मन्दिर की प्रतिष्ठा हो या कोई बड़ा आयोजन, पं. शुक्ल की महत्वपूर्ण भूमिका इन कार्यक्रमों को गौरवान्वित करती ही थी। सैकड़ों नवचण्डियों, शतचण्डियों, महारूद्र, अतिरूद्र, पीताम्बरा अर्चन आदि कई सारे बड़े-बड़े अनुष्ठान उन्होंने संपादित करवाए। सन् १९६५ से लेकर अब तक राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र एवं वागड़ क्षेत्र में सहस्राधिक यज्ञ-यागादिकों एवं बड़े-बड़े अनुष्ठानों में आचार्यत्व करने का कीर्तिमान उन्हीं के नाम पर है।
क्षेत्र भर में दशकों तक कर्मकाण्ड, मन्दिर प्रतिष्ठा, पौरोहित्य कर्म, सार्वजनिक लोक मंगल अनुष्ठानों का उन्होंने संचालन कर खूब लोकप्रियता हासिल की। इनके साथ ही वेद एवं कर्मकाण्ड तथा ज्योतिष के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित योगदान का अपूर्व इतिहास आपने रचा।
सन् १९६१ में वैशाख मास में बांसवाड़ा जिले के पाड़ी गांव में रामेश्वर महादेव के प्राचीन शिवालय में पंचकुण्डी महारूद्र यज्ञ आपके आचार्यत्व में हुआ। सन् १९६२ में बेणेश्वर धाम पर पंचकुण्डीय चण्डीयाग करवाया।
सन् १९७७ में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी के हाथों त्रिपुरा सुन्दरी में सहस्रचण्डी में नव कुण्डी यज्ञ का आचार्यत्व किया। इसी दौरान मन्दिर पर शिखर प्रतिष्ठा का कार्य हुआ। इस महायज्ञ में डेढ़ सौ विद्वान पंडितों ने हिस्सा लिया।
सन् १९७८ एवं १९९० में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं लोकप्रिय जननेता स्व. हरिदेव जोशी द्वारा त्रिपुरा सुन्दरी तीर्थ में कराए गए सहस्रचण्डी महायज्ञों में तथा नवम्बर १९७८ में कार्तिक मास में समस्त पंचाल समाज द्वारा पंचकुण्डीय शतचण्डी महायज्ञ में आचार्यत्व किया। पूर्व मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी के अनन्य मित्र एवं तांत्रिक सलाहकार के रूप में पं. महादेव शुक्ल ने जयपुर में श्री जोशी के आवास पर अनेक शतचण्डी यज्ञ एवं तांत्रिक-मांत्रिक अनुष्ठान संपादित कराए।
बांसवाड़ा में पं. शुक्ल ने एक अक्टूबर १९७९ को शतचण्डी यज्ञ तथा २० फरवरी १९८० को जयपुर में त्रिदिवसीय महामृत्युंजय यज्ञ विधान करवाया। सन् १९८१ में वैशाख मास में बांसवाड़ा जिले के खमेरा के समीप गोपीश्वर महादेव धाम मन्दिर पर पांच दिवसीय महारूद्र यज्ञ करवाया।
सन् १९८३ में जयपुर तथा अन्य स्थानों पर आपने अनेक अनुष्ठानों व यज्ञों में भाग लिया। बांसवाड़ा जिले के सालिया में १०९ कुण्डी यज्ञ आपके आचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। १० मई १९८२ को गुजरात के साबरकांठा जिलान्तर्गत तलकवाड़ा में शिव प्रासाद प्रतिष्ठा एवं पंचकुण्डीय महारूद्र यज्ञ आपके आचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। इसी प्रकार १९८२ में पाड़ला गांव में काल भैरव स्थानक पर शतचण्डी पंचकुण्डात्मक यज्ञ करवाया।
उन्होंने ९ दिसम्बर १९८२ को माहीडेम में अम्बाजी की प्रतिष्ठा, २० जनवरी १९८३ से डूंगरपुर जिले के देव सोमनाथ में पांच दिवसीय महारूद्र यज्ञ, १९८३ के वैशाख माह में बरोड़ा में शिवालय प्रतिष्ठा व महारूद्र यज्ञ सम्पन्न कराया। २७ मई १९८३ को घाटोल में शिव मन्दिर की प्रतिष्ठा व महारूद्र यज्ञ में ५० ब्राह्मणों का आचार्यत्व किया। इसी तरह पारसोला में शत चण्डी महायज्ञ, बांसवाड़ा में सामूहिक गायत्री यज्ञ, गरनावट गांव में सत्यनारायण मन्दिर एवं शिव परिवार प्रतिष्ठा, २१ से २३ फरवरी १९८४ तक पड़ोली गांव में शिवमन्दिर प्रतिष्ठा व महारूद्र यज्ञ, त्र्यम्बकेश्वर महादेव बांसवाड़ा में महामृत्युन्जय यज्ञ, १९८७ में लालीवाव मठ में नवकुण्डी यज्ञ, १०८ रामायण पारायण व शिखर प्रतिष्ठा, २२ मई १९८९ को घाटोल के लक्ष्मीनारायण मन्दिर की प्रतिष्ठा व २५ कुण्डी पांच दिवसीय विष्णु महायज्ञ आदि का आचार्यत्व किया।
अबापुरा में शिव मन्दिर प्रतिष्ठा व पंचकुण्डी महारूद्र आदि आपके आचार्यत्व में हुए। वैदिक प्रचार की दृष्टि से सन् १९८४ में मध्यप्रदेश के ग्वालियर में महामृत्युन्जय अनुष्ठान किया। फरवरी १९८५ को गुजराती पाटीदार समाज द्वारा वजाखरा में शिव मन्दिर प्रतिष्ठा व महारूद्र में आचार्यत्व किया।
आपने सन् २००४ में सिंहस्थ के समय उज्जैन में हरसिद्धि मन्दिर के पास धर्मशाला में सात दिवसीय शतचण्डी यज्ञ करवाया। इसमें द्वारका-शारदा पीठ के प्रतिनिधि, प्रमुख संत स्वामी प्रज्ञानानंद महाराज का सान्निध्य तथा अखिल भारतीय ज्योतिष महासभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं जाने-माने ज्योतिर्विद पं. बाबूलाल जोशी (रतलाम) का सहयोग प्राप्त हुआ।
मार्च् १९८६ में उनके निर्देशन में राजस्थान संस्कृत अकादमी, संस्कृत प्रचार मण्डल तथा गायत्री मण्डल के संयुक्त तत्वावधान में बांसवाड़ा कॉलेज में अखिल भारतीय वेद सम्मेलन हुआ। इसमें पं. शुक्ल की अहम भागीदारी रही तथा उन्हें सम्मानित भी किया गया। इसमें अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ० मंडन मिश्र, दिल्ली से डॉ० स्वामीनाथन एवं डॉ. कलानाथ शास्त्री तथा देश के विभिन्न वेद विद्यालयों से वैदिक विद्वानों ने हिस्सा लिया।
राष्ट्रीय परिपे्रक्ष्य में चाहे रामजन्मभूमि आन्दोलन हो या बाहरी आक्रमण, सदैव पं. शुक्ल ने अनुष्ठानों के सहारे दैवीय शक्तियों को जागृत किया। अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए उनके निर्देशन में अपूर्व ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान कई दिन तक चला। ऐसे अनगिनत आयोजन उनके आचार्यत्व में हुए।
न केवल राजस्थान, बल्कि गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र एवं कई अन्य राज्यों में उनके आचार्यत्व में महानुष्ठान, यज्ञ-यागादि हुए। प्राचीन संस्कारों को जीवन्त बनाए रखने तथा वैदिक संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन के प्रयास उनके जीवन-उद्देश्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं जिसे मृत्यु पर्यन्त उन्होंने समग्र ऊँचाइयों के साथ निभाया।
नई पीढ़ी को प्राचीन ज्ञानराशि एवं क्रियाओं की वैज्ञानिकता व शाश्वतता भरे महत्व से अवगत कराकर इनके प्रति रुचि बढ़ाए जाने के लिए पिछले दो दशक में ग्रीष्मावकाश में उनके द्वारा २४ शिविर आयोजित किए गए। इन शिविरों में विधि-विधान के साथ सामूहिक उपनयन संस्कार आयोजित कर मितव्ययता का संदेश भी दिया। इनमें पौरोहित्य, ज्योतिष, कर्मकांड, संस्कृत, सामुद्रिक रहस्य, तंत्र-मंत्र, योग आदि विषयों का आरंभिक शिक्षण एवं प्रशिक्षण दिया गया। अनेक बार राजस्थान संस्कृत अकादमी ने इन शिविरों को मान्यता देते हुए आर्थिक सहयोग प्रदान किया है।
उनकी ही प्रेरणा सुफल है कि सन् १९८२ में बांसवाड़ा में वनेश्वर शिवालय परिसर में स्व. उमाशंकर पाठक की स्मृति में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सरस्वती देवी ने गायत्री मंदिर बनवाया। इसमें गायत्री देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठा हुई। इसी प्रतिष्ठा समारोह में गणमान्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा गायत्री मंडल की स्थापना हुई, जिसमें सर्वसम्मति से पं. महादेव शुक्ल को अध्यक्ष चुना गया। राज्य सरकार से वनेश्वर महादेव परिसर में दक्षिण तरफ गायत्री मंदिर के दक्षिण तरफ पड़त जमीन सरकार से खरीद कर जन सहयोग से परकोटा एवं ३ कमरे मय बरामदे के बनवाये। विद्युत एवं जल साधन आदि की व्यवस्था करवाई।
प्राच्यविद्याओं के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण के लिए उन्होंने विधिवत रूप से २५ फरवरी १९८२ को गायत्री मंडल की स्थापना की व इसका पंजीकरण कराया। इसका उद्देश्य वैदिक संस्कृति, संस्कारों, साधना पद्धतियों का प्रचार-प्रसार एवं नई पीढ़ी को दुर्लभ ज्ञानराशि से अवगत करा कर रचनात्मक गतिविधियों का प्रोत्साहन एवं संचालन है।
गायत्री मंडल की रचनात्मक गतिविधियों में उत्तरोत्तर वृद्धि के चलते वे स्थापना से लेकर वर्षों तक इसके निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाते रहे। कर्मकांड, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, अध्यात्म आदि विषयों पर शताधिक कार्यक्रम, संगोष्ठियां, चर्चाएं आदि उन्होंने संपादित करवायी। सन् १९८५ में राजस्थान संस्कृत अकादमी के तत्वावधान में वेद विद्यालय प्रारंभ करवाया तथा बालिका संस्कृत पाठशाला, संस्कृत निदेशालय से भी प्रारंभ करवाया। पहले बैच में ६ छात्र शुक्ल यजुर्वेद पढ़ने हेतु प्रविष्ट हुए। वेद अध्यापन कार्य पं. शुक्ल ने ही किया।
सन् १९८६ में राजस्थान संस्कृत अकादमी एवं गायत्री मंडल के संयुक्त तत्वावधान में २१ दिवसीय पौरोहित्य प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया। उद्घाटन के अवसर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी एवं डॉ. मंडन मिश्र तथा डॉ. पट्टाभिराम शास्त्री भी शामिल हुए थे। इस शिविर में बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर व प्रतापगढ़ आदि इलाकों प्रशिक्षणार्थी उपस्थित हुवे, जिसकी संख्या ९० थी। प्रतापगढ़ से आने वाले श्रीहरि शुक्ल ने यजुर्वेद पूर्ण पढ़ा जो अभी वर्तमान में अपने स्तर पर श्री केशवराय मन्दिर, प्रतापगढ़ में वेद पाठशाला चला रहे हैं। सन् १९८७ में राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा वेदाध्यापक साकेत बिहारी, वेदाचार्य निवासी रीवां, ग्वालियर की नियुक्ति की जिन्होंने २ साल तक वेदाध्यापन कराया व अन्यत्र राजकीय विद्यालय में नियुक्ति हो जाने से चले गये। इसके बाद काफी समय तक पं. शुक्ल ने ही बांसवाड़ा के वेद विद्यालय का संचालन किया।
पं. शुक्ल ने सन् १९८८ व १९९० में त्रिपुरा सुन्दरी तीर्थ पर, तथा १९८९ में बांसवाड़ा में कर्मकाण्ड व ज्योतिष शिक्षण शिविर लगाया। शिविर समापन के अवसर पर उदयपुर, मेवाड़ महामण्डलेश्वर महंत मुरलीमनोहरशरण शास्त्री एवं श्रीरामबोला मठ, डूंगरपुर के महामण्डलेश्वर श्री केशवदास जी महाराज सहित अनेक संत-महात्माओं और महन्तों का सान्निध्य प्राप्त होता रहा।
इन शिविरों के माध्यम से अब तक एक हजार से अधिक प्रशिक्षणार्थी कर्मकाण्ड, ज्योतिष आदि का प्रारंभिक प्रशिक्षण पा चुके हैं। इनमें से अधिकांश युवाओं ने इन विधाओं को अपने रोजगार का माध्यम बनाया हुआ है। इनके साथ ही पीताम्बरा, श्रीविद्या आदि गुह्य साधनाओं के प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन भी हुआ है।
सन् २००२ में राजस्थान संस्कृत अकादमी एवं गायत्री मंडल के संयुक्त तत्वावधान में बांसवाड़ा में आपके निर्देशन में वेद वेदांग सम्मेलन सम्पन्न हुआ। जिसका उद्घाटन राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल न्यायमूर्ति श्री अंशुमानसिंह ने किया। इसमें हिन्दुस्तान के विद्वानों के साथ ही नेपाल से भी वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
केन्द्रीय संस्कृत अकादमी, शंकर विद्या केन्द्र, राजस्थान संस्कृत अकादमी, वेद विद्या प्रतिष्ठान, सांदीपनि वेद विद्या संस्थान आदि संस्थाओं द्वारा आयोजित होने वाले वैदिक शिविरों में संभागी एवं वार्ताकार के रूप में आपने हिस्सा लिया।
राज्य सरकार द्वारा यहां वनेश्वर मन्दिर के पास उपलब्ध कराई गई ३ बीघा ६ बिस्वा भूमि पर साधना कक्ष बने हुए हैं। उनके निर्देशन में वेद विद्यालय व राजकीय संस्कृत पाठशाला भी चली। पं. शुक्ल की इच्छा थी कि इस परिसर में सत्संग कक्ष, पीताम्बरा शक्तिपीठ परिसर आदि की स्थापना हो। राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा यहां स्थापित वेद विद्यालय से कई छात्रों ने सस्वर वेद ज्ञान लिया है।
मण्डल की कई संस्थाएं विविध क्षेत्रों में चल रही हैं। अखिल भारतीय एवं प्रदेशस्तरीय वेद सम्मेलनों, उपनिषदों तथा विविध आयोजनों में वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए उन्हें अनेक अवसरों पर सम्मानित किया गया है। दुर्लभ ज्ञानराशि के जानकार एवं आधिकारिक विद्वान होते हुए भी पुरस्कारों एवं सम्मान की कामना से परे रहकर वे काम करते रहे। उनके नेतृत्व में गायत्री मण्डल ने दक्षिणांचल में वेद, ज्योतिष, कर्मकाण्ड और साधना प्रशिक्षण तथा प्रचार-प्रसार की प्रमुख संस्था के रूप में ख्याति प्राप्त की है।
वागड़ क्षेत्र की प्राचीन पूजा पद्धतियों के संरक्षण तथा नई पीढ़ी में सरल एवं सुबोधगम्य संवहन के लिए व्यापक कार्य किए हैं। उनके प्रयासों से ही गायत्री मण्डल का छोटा-सा पुस्तकालय संचालित हो रहा है, जिसके लिए पं. पन्नालाल जोशी की पुस्तकें भी जोशी परिवार द्वारा प्रदान की गई हैं। इस पुस्तकालय की स्थापना में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी सहयोग प्रदान किया है।
महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान के तत्वावधान में १२ अगस्त २००० को उज्जैन में आयोजित समारोह में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरलीमनोहर जोशी ने अखिल भारतीय वैदिक सम्मान समारोह में पं. शुक्ल को १० हजार रुपए प्रदान कर एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।
राजस्थान संस्कृत अकादमी, जयपुर द्वारा सन् २००२ में पं. महादेव शुक्ल को पं. वीरेश्वर शास्त्री पौरोहित्य सम्मान प्रदान किया गया। इसी प्रकार महाराणा मेवाड फाउन्डेशन, उदयपुर द्वारा राष्ट्रीय परिवेश में वैदिक संस्कृति, पुराण तथा कर्मकाण्ड के क्षेत्र में जनचेतनार्थ सम्पादित स्थायी मूल्यों की सेवाओं के उपलक्ष्य में ९ मार्च २००३ को उदयपुर में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में हारीत राशि सम्मान से अलंकृत किया गया है। राजस्थान संस्कृत अकादमी तथा श्रीनाथद्वारा मन्दिर मण्डल के संयुक्त तत्वावधान में विक्रम संवत २०४८ में नाथद्वारा में आयोजित त्रि दिवसीय अखिल भारतीय वैदिक सम्मेलन में भी आपको सम्मानित किया गया।
महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन तथा निम्बार्क संस्थान, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में २४ से २६ फरवरी २००२ (संवत् २०५८) में उदयपुर में आयोजित त्रि-दिवसीय क्षेत्रीय वैदिक सम्मेलन में उन्हें मेवाड़ महामण्डलेश्वर महन्त मुरलीमनोहरशरण शास्त्री द्वारा ''वेद मार्त्तण्ड'' उपाधि से सम्मानित किया गया। इसके अलावा संस्कृत एवं वेद संस्थानों तथा अकादमियों के निमंत्रण पर प्रदेश एवं देश के विभिन्न हिस्सों में वेद सम्मेलनों, ज्योतिष संगोष्ठियों और पौरोहित्य गतिविधियों में आपकी भागीदारी रही।
बाँसवाड़ा एवं डूंगरपुर जिलों के ब्राह्मण समुदाय के संगठन वागड़ प्रान्तीय औदीच्य ब्राह्मण समाज के सम्मेलन में ब्राह्मण समाज की ओर से पं. शुक्ल को श्री महामण्डलेश्वर महंत केशवदासजी महाराज द्वारा ब्रह्मर्षि की उपाधि दी गई। श्रीरामबोला मठ, डूँगरपुर के महामण्डलेश्वर केशवदासजी महाराज ने २००३ में डूंगरपुर में आयोजित समारोह में अभिनंदन पत्र भेटकर उन्हें सम्मानित किया। इसी प्रकार अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा उदयपुर सहित अनेक संस्थाओं द्वारा आपका अभिनन्दन किया गया।
पं. महादेव शुक्ल ने त्रिपुरा सुन्दरी तीर्थ में २१ से २३ मार्च, २००६ को इन्दिरा गांधी कला कोष, नई दिल्ली एवं गायत्री मंडल के संयुक्त तत्वावधान में क्षेत्रीय वेद सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न करवाया।
निष्काम कर्मयोगी पं. महादेव शुक्ल समाज-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग हमेश प्रदान किया। बात चाहे समाज सेवा, सांस्कृतिक परम्पराओं के रक्षण या संवर्धन की हो अथवा धार्मिक चेतना के लिए संघर्ष की, नई पीढ़ी को साथ लेकर आगे चलने एवं प्रोत्साहन की परम्परा को निभाते हुए काम करने की उनकी विशिष्टता हर कर्म में परिलक्षित होती थी।
वर्ष २००८ में प्राचीन और प्रसिद्ध लालीवाव मठ में आयोजित महन्त नारायणदास स्मृति समारोह में लालीवाव पीठाधीश्वर महन्त हरिओमशरणदास महाराज तथा अन्य संत-महात्माओं और धर्म-अध्यात्म जगत के विद्वानों की ओर से पं. महादेव शुक्ल को देवर्षि की उपाधि से विभूषित किया गया।
किसी भी प्रकार की धार्मिक और आध्यात्मिक जिज्ञासा का समाधान पाने के लिए पं. शुक्ल से उनके दूरभाष नम्बर पर सम्पर्क कर हर कोई जिज्ञासुजन अपनी जिज्ञासा शांत होने का सुकून प्राप्त कर आनंद की अनुभूति करता था।
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल को फरवरी के अंतिम सप्ताह में तबीयत खराब होने पर बांसवाड़ा के एमजी अस्पताल में भरती कराया गया। इसके बाद उन्हें एमबी अस्पताल उदयपुर ले जाया गया जहां फाल्गुन शुक्ल बुधाष्टमी ४ मार्च की रात सवा ग्यारह बजे उन्होंने अंतिम साँस ली।
सादगीपूर्ण जीवन के पर्याय, शुचिता की प्रतिमूर्ति और, पीताम्बरा मां के अनन्य उपासक पं. महादेव शुक्ल के व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व की लहरों के साथ ही दृष्टिगोचर होता था कि उनके भीतर ज्ञान का विराट सागर भावों की लहरों के साथ निरन्तर उमड़ रहा है। लौकिक कामनाओं से परे पं. शुक्ल के जीवन का ध्येय यही था -न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नाऽपि पुनर्भवम्। कामये दुःख तप्तानाम् प्राणिनाम्आर्तिनाशनम्॥
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल यद्यपि अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन प्राच्य संस्कृति के संरक्षण-संवर्द्धन के क्षेत्र में उन्होंने शिष्यों की जो फसल तैयार की है उसके जरिये वे लोक जीवन में अमर हो गए हैं।
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देश भर में अपनी प्रतिभा की धाक जमाने वाले देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के निधन पर वागड़ अंचल की विभिन्न संस्थाओं और संगठनों ने भावभीनी श्रद्धान्जलि अर्पित की है और कहा है कि उनके महाप्रयाण से क्षेत्र में धर्म-संस्कृति और अध्यात्म जगत का दैदीप्यमान नक्षत्र खो दिया है।
श्रीमद भागवत समिति एवं गणेश भक्त मण्डल के तत्वावधान में शहर के प्रसिद्ध सिद्धि विनायक
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल की स्मृति में श्रद्धान्जलि सभा में उमड़ा श्रद्धा का ज्वार
बांसवाड़ा में पीताम्बरा शक्तिपीठ स्थापना होगी
धर्म-संस्कृति व अध्यात्म क्षेत्र में रचनात्मक अभियान चलाने का संकल्प
बांसवाड़ा, १६ मार्च/जाने-माने अध्यात्म चिन्तक और प्राच्यविद्यामनीषी देवर्षि पं. महादेव शुक्ल की स्मृति में सोमवार को बांसवाड़ा के औदीच्यवाड़ा स्थित सेठ साँवरिया धर्मशाला में विभिन्न संस्थाओं, समाजों और बुद्धिजीवियों की ओर से आयोजित श्रद्धान्जलि सभा में पं. शुक्ल के शिष्यों और वागड़, कांठल एवं मेवाड़ के प्रबुद्धजनों ने भावभीनी श्रद्धान्जलि अर्पित की और पं. शुक्ल के अधूरे कार्यों को पूर्ण करने के लिए तन-मन-धन से जुटने का संकल्प ग्रहण किया।
श्रद्धान्जलि सभा में उपस्थित संभागियों ने पं. शुक्ल की तस्वीर पर पुष्प अर्पित किए और अपनी ओर से भावपूर्ण पुष्पान्जलि दी। सभा की शुरूआत ब्रह्मर्षि पं. भालचन्द्र शुक्ल के आचार्यत्व में पण्डितों के समूह द्वारा वैदिक मंगलाचरण एवं पुण्याहवाचन से हुई। इसमें वेद विद्वानों पं. श्री हरि शुक्ल(प्रतापगढ़), पं. हर्षदराय नागर, पं. इन्द्रशंकर झा तथा पं. जयनारायण पण्ड्या, पं. राजेश त्रिवेदी, पं. विनय भट्ट, पं. मनोज रावल, पं. चन्द्रकान्त मेहता, पं. प्रदीप भट्ट, आदि ने विभिन्न वेदों की ऋचाओं का सस्वर गान किया और भद्र सूक्त का पठन किया।
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के समग्र जीवन आयामों पर साहित्यकार श्री प्रकाश पण्ड्या ने पत्रवाचन किया और पं. शुक्ल के व्यक्तित्व एवं कर्मयोग के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला।
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के संकल्पों के अनुसार गायत्री मण्डल की
भावी योजनाओं पर पं. लोकेन्द्र भट्ट ने जानकारी दी और बताया कि गायत्री मण्डल परिसर में देवी बगलामुखी एवं मृत्युन्जय महादेव मन्दिर के साथ पीताम्बरा शक्तिपीठ स्थापित करने,, संदर्भ पुस्तकालय एवं गौशाला संचालन, पौरोहित्य एवं ज्योतिष प्रशिक्षण शिविर, पं. शुक्ल की स्मृति में पुरस्कार एवं सम्मान स्थापित करने आदि योजनाओं के बारे में जानकारी दी।
सभा में सभी वक्ताओं ने देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के निधन को अपूरणीय क्षति बताया और कहा कि उनके संकल्पों को साकार करने के लिए समूचा समाज, सभी रचनात्मक संस्थाएं और प्रबुद्धजन तथा भामाशाह कृत संकल्पित हैं और इसके लिए हरसंभव कोशिशें की जाएंगी। इसके लिए सभी स्तरों पर प्रयास किया जाएगा। सभी वक्ताओं ने कहा कि पं. शुक्ल ने अपनी विद्या और साधनाओं के बल पर देश भर में वागड़ अंचल को गौरवान्वित किया है। उनकी स्थापित परम्पराओं और आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए समर्पित प्रयास होंगे।
सभा में समाजसेवी दिनेश जोशी ने स्वर्गीय हरिदेव जोशी व पं. महादेव शुक्ल के सघन आत्मीय रिश्तों का जिक्र किया और कहा कि पं. शुक्ल के कार्यों को योजनाबद्ध स्वरूप दिए जाने के लिए ठोस प्रयास होंगे।
जाने-माने ज्योतिर्विद, राजस्थान ब्राह्मण महासभा के प्रदेश उपाध्यक्ष पं. लक्ष्मीनारायण द्विवेदी ने युगपुरुष पं. शुक्ल के राष्ट्रीय व्यक्तित्व का स्मरण किया। सभा में प्रसिद्ध अभिभाषक लक्ष्मीकान्त त्रिवेदी, समाजसेवी झुमकलाल तेली, श्रीमद् भागवत समिति के अध्यक्ष शंकरलाल दोसी, साहित्यकार भूपेन्द्र तनिक, पीताम्बरा परिषद के अध्यक्ष पं. दिनेश भट्ट आदि ने विचार रखे और पं. शुक्ल के कार्यों को पूर्ण करने के लिए सभी संस्थाओं और समाजों की भागीदारी का आश्वासन दिया।
मुम्बई के साहित्यकार पं. मोहन जोशी ने पं. महादेव शुक्ल पर सुमधुर कविता प्रस्तुत की। श्रद्धान्जलि सभा का संचालन दीपक द्विवेदी ने किया।
इस अवसर पर देवर्षि पं. शुक्ल को श्रद्धान्जलि अर्पित करने वालों में घाटोल के उपखण्ड अधिकारी भवानीसिंह पालावत, पं. धरणीधर शास्त्री, ब्राह्मण महासभा के जिलाध्यक्ष चन्दूलाल उपाध्याय, डॉ. नर्मदाशंकर रणा आदि विशिष्टजन प्रमुख हैं। कई अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों, समाजसेवियों और समाजों के प्रतिनिधियों ने पुष्पान्जलि अर्पित की।
गायत्री मण्डल के लिए दो लाख के सहयोग की घोषणा
श्रद्धान्जलि सभा में देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के शिष्यों और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों तथा बुद्धिजीवियों ने गायत्री मण्डल की गतिविधियों को सम्बल देने के लिए करीब दो लाख रुपए के सहयोग की घोषणा की। इनमें देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के पुत्र श्री कृष्णकान्त शुक्ल ने ५१ हजार रुपए देने की घोषणा की जबकि पीताम्बरा परिषद के संयोजक पं. दिनेश भट्ट तथा परिषद के सह संयोजक डॉ. दीपक आचार्य ने २५-२५ हजार रुपए भेंट करने की घोषणा की। इसी प्रकार राजस्थान ब्राह्मण महासभा की जिला इकाई तथा श्रीमद्भागवत समिति ने ५-५ हजार रुपए, पं. जयप्रकाश पण्ड्या ने ११ हजार रुपए दिए जाने की घोषणा की।
सभा में देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के शिष्यों दीपक द्विवेदी, एपीआरओ श्रीमती कल्पना, पं. राजेश त्रिवेदी, पं. जयनारायण पण्ड्या, नरेन्द्र आचार्य, प्रकाश पण्ड्या, पं. विनय भट्ट, बृजमोहन तूफान, कन्हैयालाल जोशी, विद्यासागर शुक्ल ने पांच-पांच हजार रुपए प्रदान किए जाने की घोषणा की। इसी प्रकार पीताम्बरा परिषद एवं गायत्री मण्डल के एक सौ से अधिक सदस्यों की ओर से एक-एक हजार रुपए की राशि आजीवन सदस्यता के लिए प्रदान करने की घोषणा की गई। सभा में जानकारी दी गई कि गायत्री मण्डल की ओर से मार्च माह में एक-एक हजार रुपए की राशि से पांच सौ आजीवन सदस्य बनाये जाएंगे। इस स्थायी कोष से गायत्री मण्डल की नियमित गतिविधियों का संचालन किया जाएगा।
धर्म-अध्यात्म के शिखर पुरुष देवर्षि पं. महादेव शुक्ल स्मृति ग्रंथ प्रकाशित होगा
संतों-महंतों और संस्थाओं ने दी भावपूर्ण श्रद्धान्जलि
श्रद्धान्जलि सभा सोमवार को सेठ सांवरिया औदीच्य धर्मशाला में
बांसवाडा, १५ मार्च/हिन्दुस्तान के वैदिक विद्वानों और प्राच्यविद्या जगत म मशहूर जानी-मानी हस्ती देवर्षि पं. महादेव शुक्ल को श्रद्धान्जलि देने के लिए १६ मार्च, सोमवार को प्रातः ९.३० बजे बांसवाड़ा के औदीच्यवाड़ा स्थित सेठ सांवरिया धर्मशाला में श्रद्धान्जलि सभा एवं भण्डारा का आयोजन किया जाएगा। इसमें देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के शिष्य, श्रीविद्या, गायत्री एवं पीताम्बरा के साधक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि और गणमान्य विद्वान हिस्सा लेंगे। इसमें पं. शुक्ल के व्यक्तित्व और कर्मयोग पर वक्ताओं की ओर से विचार रखे जाएंगे तथा पं. शुक्ल के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए कार्ययोजना व भावी कार्यक्रमों पर विचार किया जाएगा।
देवर्षि पर प्रकाशित होगा स्मृति ग्रंथ
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के व्यक्तित्व और दशकों तक की गई धर्म-अध्यात्म, संस्कृति और समाज की सेवा से भरे समग्र कर्मयोग को युगों तक चिरस्थायी बनाए रखने के लिए पीताम्बरा परिषद की ओर से बहुरंगी स्मृति ग्रंथ प्रकाशित किया जाएगा। इसमें. उनके व्यक्तित्व, कर्मयोग तथा जीवन पर आधारित आलेखों, छायाचित्रों आदि का समावेश होगा। ग्रंथ में पं. शुक्ल के बारे में देश के प्रसिद्ध संत-महात्माओं और विद्वजनों के आलेखों के साथ ही तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, प्राच्यविद्याओं, पीताम्बरा एवं श्रीविद्यासाधना तथा अन्य आध्यात्मिक विषयों पर संग्रहणीय सामग्री का समावेश किया जाएगा।
परिषद के अध्यक्ष दिनेश भट्ट ने बताया कि यह ग्रंथ प्रसिद्ध लेखक और देवर्षि के पट्ट शिष्य, बांसवाडा के जिला सूचना एवं जन सम्पर्क अधिकारी डॉ. दीपक आचार्य के संपादन म प्रकाशित किया जाएगा। भट्ट ने सभी विद्वानों और देवर्षि पं. शुक्ल के करीबी रहे गणमान्य व्यतियों से आग्रह किया है कि वे इसके लिए सामग्री भिजवाये।
श्रद्धान्जलि अनुष्ठान होगा
पीताम्बरा परिषद की ओर से मार्च के अंतिम सप्ताह म देवर्षि पं. महादेव शुक्ल की स्मृति म श्रद्धान्जलि अनुष्ठान का आयोजन होगा। इसम देवर्षि के सभी शिष्य और प्रशंसक हिस्सा लगे। इसके अन्तर्गत लघु रूद्र, पीताम्बरा और श्रीविद्या अनुष्ठान तथा वैदिक विधि विधान के अनुष्ठान होंगे। इसम पं. शुक्ल के अधूरे कार्यों को मूर्त्त रूप देने पर विचार किया जाएगा।
संत-महंतों ने कहा - अपूरणीय क्षति
देश के विभिन्न मठों और अखाडों के संत-महन्तों ने देवर्षि पं. महादेव शुल के निधन को धर्म-संस्कृति और अध्यात्म जगत के लिए महान क्षति बताया है और कहा है कि इस तरह का मनीषी युगों म पैदा होता है। राष्ट्रीय अनि अखाडा के महंत एवं श्रीरामबोला मठ डूंगरपुर के महंत केशवदास महाराज, बेणेश्वर पीठाधीश्वर गोस्वामी अच्युतानंद महाराज, महाकाल मठ के स्वामी रामानंद ब्रह्मचारी, गुरु आश्रम छींच के महंत घनश्यामदास महाराज, लालीवाव मठ के पीठाधीश्वर महंत हरिओमशरणदास, भारतमाता मन्दिर के महंत रामस्वरूप महाराज सहित कई संत-महंतों ने पं. महादेव शुक्ल के प्रति भावपूर्ण श्रद्धान्जलि अर्पित की है।
ज्योतिष परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रसिद्ध ज्योतिर्विद पं. बाबूलाल जोशी(रतलाम) ने देवर्षि के महाप्रयाण को उत्तर भारत के धर्म-अध्यात्म जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया है और कहा है कि जिन उंचाइयों के बूते उन्होंने लोढ़ी काशी को पूरे देश में गौरव प्रदान किया था, वह कर्मयोग का अनूठा उदाहरण है।
जीवनवृत्त
स्मृति शेष वेद मार्त्तण्ड युग पुरुष देवर्षि पं. महादेव शुक्ल
नई पीढ़ी को प्राच्यविद्याओं से रूबरू कराने वाले कालजयी भगीरथ
प्रस्तुति - डॉ. दीपक आचार्य
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ऋषि-मुनियों की प्राचीन तपोभूमि वाग्वर धरा रत्नगर्भा रही है। यह पुण्य भूमि आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक समृद्धि की सुरभि से सुधी जनों के हृदय को अनुप्राणित करती रही है। संत परम्परा का एक सुदृढ़ आधार रखने वाली इस पावन धरा ने अनेक श्रेष्ठ रत्नों को जन्म दिया है।
यहाँ के संतों में दुर्लभजी, भैरवानन्द, केशवाश्रम, भगवानदास, उदासी महाराज, गवरी बाई, बड़लिया वाले भोलानाथ महाराज, स्वामी रामानन्द सरस्वती, स्वामी स्वतंत्रतानंद महाराज आदि प्रमुख हैं। वहीं संस्कृत विद्वानों और वेदज्ञों की परम्परा में पं. रामचन्द्र जी, पं. पन्नालाल जोशी, पं. धनशंकर नागर, पं. भजामीशंकर, पं. शुभशंकर, पं. ललिताशंकर, डॉ. मनोहरलाल द्विवेदी, देवर्षि पं. महादेव शुक्ल आदि चर्चित रहे हैं।
जब कभी हिन्दुस्तान में वैदिक संस्कृति और पुरातन विधाओं का जिक्र आता है बांसवाड़ा का अहम स्थान होता है। वाग्वर का अर्थ है- वाक्+वर अर्थात वाणी में श्रेष्ठ। इस दृष्टि से विद्वानों और साधकों की अक्षुण्ण परम्परा यहां सदैव विद्यमान रही है। यहां के संस्कृतज्ञों एवं प्राच्यविद्या मर्मज्ञों की परम्परा में निष्काम कर्मयोगी वेद मार्त्तण्ड ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल का नाम बड़े ही आदर और गौरव के साथ लिया जाता है।
पुरातन कर्मकांड एवं प्राचीन विद्याओं से भरे पूरे इस अंचल में संतों-पंडितों ने इन विद्याओं को विज्ञान के साथ जोड़ कर जन-जन तक सरल एवं सहज ढंग से सम्प्रेषित किया और बताया कि यह विद्याएं मनुष्य की लोक कल्याणकारी सृजनशीलता का निस्सीम विस्तार कर सीमाओं के बंधन से मुक्त कराती है। मंत्र और तंत्र का उद्देश्य भी वही हैं। 'तनु विस्तारयते इति तंत्र'। पं. महादेव शुक्ल ने तंत्र के इसी स्वरूप को अपनाया। वैयक्तिक ऐषणाओं से परे रहने वाले पं. शुक्ल का समग्र जीवन त्याग का पर्याय रहा है।
आपका जन्म विक्रम संवत् १९७९ कार्तिक कृष्ण दशमी, तदनुसार १३ नवम्बर १९२२ को हुआ। उन्हें पौरोहित्य कर्म, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र एवं आध्यात्मिक संस्कार अपने पिता श्री शंकरलाल जी से मिले। पारिवारिक विरासत से प्राप्त संस्कारों को निरन्तर ज्ञानार्जन से परिपुष्ट किया पं. शुक्ल ने।
यह संयोग ही है कि पं. शुक्ल की साधना स्थली उनका निवास किसी समय बहुत बड़े तांत्रिकाचार्य की सिद्ध स्थली रहा है। इस बारे में कई रोचक घटनाएँ बहुश्रुत हैं। वे विद्वानों और सिद्ध संतों से संपर्क में रहे और अनेक सिद्धियां एवं मांत्रिक-तांत्रिक क्रियाएं प्राप्त कीं। उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा बांसवाड़ा में ही हुई। यहां उन्होंने हिन्दी एवं अंगे्रजी विषयों के साथ उच्च प्राथमिक स्तर की शिक्षा पायी।
सन् १९३६ में उन्होंने भगवान महाकाल की नगरी उज्जयिनी जाकर रामघाट स्थित बनारस संस्कृत कॉलेज से संबंधित हरनंदराय रूईया संस्कृत पाठशाला में प्रवेश लिया। यहाँ उन्होंने पं. श्रीधरजी शास्त्री से शिक्षा प्राप्त करते हुए सन् १९३७ में बंगाल एसोसिएशन, कलकत्ता से संस्कृत प्रथमा परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से व्याकरण प्रथमा की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् १९४० में काशी के संस्कृत विद्यालय से संस्कृत प्रथमा की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हीं दिनों आजादी के संघर्ष में भी उन्होंने हिस्सा लिया। शुक्ल यजुर्वेद के अध्ययन हेतु उन्हें पाठशाला से बाहर रहना पड़ा। इसलिए उन्होंने हरसिद्धि मन्दिर के पास श्री गणपतलाल जी वकील के मकान में कमरा लिया तथा श्री बसन्तीलालजी शुक्ल भागसीपुरा से यजुर्वेद व साहित्य की पढ़ाई की। इसके साथ ही कर्मकाण्ड भी सीखते रहे। वे श्री ओंकार जी महाराज से भी पढ़ते रहे। श्री् संकर्षण व्यास जी से सामान्य ज्योतिष व कुण्ड सिद्धि आदि की पढ़ाई की।
संस्कृत भाषा के अध्ययन के पश्चात उज्जैन के राजकीय संस्कृत विद्यालय, महाकालेश्वर में वेद अध्ययन किया और अनवरत अध्ययनकर शुक्ल यजुर्वेद में पारंगत हुए। सन् १९५३ में बनारस संस्कृत कॉलेज के इन्दौर केन्द्र से प्रवेश पाकर राजकीय संस्कृत विद्यालय बनारस से शुक्ल यजुर्वेद मध्यमा परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। इस बीच स्वतन्त्रता आन्दोलन में हिन्दू महासभा का भी प्रचार किया
संस्कृत और वेद का अध्ययन पूरा कर पंडित शुक्ल ने अपना सारा जीवन वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में समर्पित कर दिया। सन् १९५४ में गुजरात में बड़ोदरा जिले में नर्मदा किनारे वेद प्रचारार्थ कोरल गांव में आशापुरी माता मन्दिर में पाँच साल तक रहे वेद पाठशाला स्थापित की। इसमें आरंभ में दस छात्रों से वेद कक्षा शुरू कर वैदिक प्रचार किया। सन् १९६३ में भी कोरल गांव में ब्राह्मण समाज को एकत्रित कर २४ लाख गायत्री जप का पुरश्चरण व पंचकुण्डी गायत्री यज्ञ सम्पन्न करवाया। इसके पश्चात् कुछ वर्ष नारेश्वर श्री रंग अवधूत के आश्रम में निवास किया व वहां पर भी वेदाध्ययन करवाते रहे। इसी दौरान् अनेक बालकों को कर्मकाण्ड सिखाया।
बहिर्मुखी स्वभाव से काफी दूर पं. शुक्ल सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना से निर्लिप्त रहकर सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों के संचालन में ताजिन्दगी अहम भूमिका निभाते रहे।
सन् १९५६ में अष्टग्रही योग के मद्देनज़र विश्वशान्ति के उद्देश्य से श्रावण मास में वेद प्रचार के उद्देश्य से समस्त ब्राह्मण समाज को एकत्रित कर वनेश्वर शिवालय में २४ लाख गायत्री जप (पुरश्चरण) सम्पन्न करवाया। क्षेत्र में किसी मन्दिर की प्रतिष्ठा हो या कोई बड़ा आयोजन, पं. शुक्ल की महत्वपूर्ण भूमिका इन कार्यक्रमों को गौरवान्वित करती ही थी। सैकड़ों नवचण्डियों, शतचण्डियों, महारूद्र, अतिरूद्र, पीताम्बरा अर्चन आदि कई सारे बड़े-बड़े अनुष्ठान उन्होंने संपादित करवाए। सन् १९६५ से लेकर अब तक राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र एवं वागड़ क्षेत्र में सहस्राधिक यज्ञ-यागादिकों एवं बड़े-बड़े अनुष्ठानों में आचार्यत्व करने का कीर्तिमान उन्हीं के नाम पर है।
क्षेत्र भर में दशकों तक कर्मकाण्ड, मन्दिर प्रतिष्ठा, पौरोहित्य कर्म, सार्वजनिक लोक मंगल अनुष्ठानों का उन्होंने संचालन कर खूब लोकप्रियता हासिल की। इनके साथ ही वेद एवं कर्मकाण्ड तथा ज्योतिष के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित योगदान का अपूर्व इतिहास आपने रचा।
सन् १९६१ में वैशाख मास में बांसवाड़ा जिले के पाड़ी गांव में रामेश्वर महादेव के प्राचीन शिवालय में पंचकुण्डी महारूद्र यज्ञ आपके आचार्यत्व में हुआ। सन् १९६२ में बेणेश्वर धाम पर पंचकुण्डीय चण्डीयाग करवाया।
सन् १९७७ में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी के हाथों त्रिपुरा सुन्दरी में सहस्रचण्डी में नव कुण्डी यज्ञ का आचार्यत्व किया। इसी दौरान मन्दिर पर शिखर प्रतिष्ठा का कार्य हुआ। इस महायज्ञ में डेढ़ सौ विद्वान पंडितों ने हिस्सा लिया।
सन् १९७८ एवं १९९० में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं लोकप्रिय जननेता स्व. हरिदेव जोशी द्वारा त्रिपुरा सुन्दरी तीर्थ में कराए गए सहस्रचण्डी महायज्ञों में तथा नवम्बर १९७८ में कार्तिक मास में समस्त पंचाल समाज द्वारा पंचकुण्डीय शतचण्डी महायज्ञ में आचार्यत्व किया। पूर्व मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी के अनन्य मित्र एवं तांत्रिक सलाहकार के रूप में पं. महादेव शुक्ल ने जयपुर में श्री जोशी के आवास पर अनेक शतचण्डी यज्ञ एवं तांत्रिक-मांत्रिक अनुष्ठान संपादित कराए।
बांसवाड़ा में पं. शुक्ल ने एक अक्टूबर १९७९ को शतचण्डी यज्ञ तथा २० फरवरी १९८० को जयपुर में त्रिदिवसीय महामृत्युंजय यज्ञ विधान करवाया। सन् १९८१ में वैशाख मास में बांसवाड़ा जिले के खमेरा के समीप गोपीश्वर महादेव धाम मन्दिर पर पांच दिवसीय महारूद्र यज्ञ करवाया।
सन् १९८३ में जयपुर तथा अन्य स्थानों पर आपने अनेक अनुष्ठानों व यज्ञों में भाग लिया। बांसवाड़ा जिले के सालिया में १०९ कुण्डी यज्ञ आपके आचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। १० मई १९८२ को गुजरात के साबरकांठा जिलान्तर्गत तलकवाड़ा में शिव प्रासाद प्रतिष्ठा एवं पंचकुण्डीय महारूद्र यज्ञ आपके आचार्यत्व में सम्पन्न हुआ। इसी प्रकार १९८२ में पाड़ला गांव में काल भैरव स्थानक पर शतचण्डी पंचकुण्डात्मक यज्ञ करवाया।
उन्होंने ९ दिसम्बर १९८२ को माहीडेम में अम्बाजी की प्रतिष्ठा, २० जनवरी १९८३ से डूंगरपुर जिले के देव सोमनाथ में पांच दिवसीय महारूद्र यज्ञ, १९८३ के वैशाख माह में बरोड़ा में शिवालय प्रतिष्ठा व महारूद्र यज्ञ सम्पन्न कराया। २७ मई १९८३ को घाटोल में शिव मन्दिर की प्रतिष्ठा व महारूद्र यज्ञ में ५० ब्राह्मणों का आचार्यत्व किया। इसी तरह पारसोला में शत चण्डी महायज्ञ, बांसवाड़ा में सामूहिक गायत्री यज्ञ, गरनावट गांव में सत्यनारायण मन्दिर एवं शिव परिवार प्रतिष्ठा, २१ से २३ फरवरी १९८४ तक पड़ोली गांव में शिवमन्दिर प्रतिष्ठा व महारूद्र यज्ञ, त्र्यम्बकेश्वर महादेव बांसवाड़ा में महामृत्युन्जय यज्ञ, १९८७ में लालीवाव मठ में नवकुण्डी यज्ञ, १०८ रामायण पारायण व शिखर प्रतिष्ठा, २२ मई १९८९ को घाटोल के लक्ष्मीनारायण मन्दिर की प्रतिष्ठा व २५ कुण्डी पांच दिवसीय विष्णु महायज्ञ आदि का आचार्यत्व किया।
अबापुरा में शिव मन्दिर प्रतिष्ठा व पंचकुण्डी महारूद्र आदि आपके आचार्यत्व में हुए। वैदिक प्रचार की दृष्टि से सन् १९८४ में मध्यप्रदेश के ग्वालियर में महामृत्युन्जय अनुष्ठान किया। फरवरी १९८५ को गुजराती पाटीदार समाज द्वारा वजाखरा में शिव मन्दिर प्रतिष्ठा व महारूद्र में आचार्यत्व किया।
आपने सन् २००४ में सिंहस्थ के समय उज्जैन में हरसिद्धि मन्दिर के पास धर्मशाला में सात दिवसीय शतचण्डी यज्ञ करवाया। इसमें द्वारका-शारदा पीठ के प्रतिनिधि, प्रमुख संत स्वामी प्रज्ञानानंद महाराज का सान्निध्य तथा अखिल भारतीय ज्योतिष महासभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं जाने-माने ज्योतिर्विद पं. बाबूलाल जोशी (रतलाम) का सहयोग प्राप्त हुआ।
मार्च् १९८६ में उनके निर्देशन में राजस्थान संस्कृत अकादमी, संस्कृत प्रचार मण्डल तथा गायत्री मण्डल के संयुक्त तत्वावधान में बांसवाड़ा कॉलेज में अखिल भारतीय वेद सम्मेलन हुआ। इसमें पं. शुक्ल की अहम भागीदारी रही तथा उन्हें सम्मानित भी किया गया। इसमें अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ० मंडन मिश्र, दिल्ली से डॉ० स्वामीनाथन एवं डॉ. कलानाथ शास्त्री तथा देश के विभिन्न वेद विद्यालयों से वैदिक विद्वानों ने हिस्सा लिया।
राष्ट्रीय परिपे्रक्ष्य में चाहे रामजन्मभूमि आन्दोलन हो या बाहरी आक्रमण, सदैव पं. शुक्ल ने अनुष्ठानों के सहारे दैवीय शक्तियों को जागृत किया। अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए उनके निर्देशन में अपूर्व ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान कई दिन तक चला। ऐसे अनगिनत आयोजन उनके आचार्यत्व में हुए।
न केवल राजस्थान, बल्कि गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र एवं कई अन्य राज्यों में उनके आचार्यत्व में महानुष्ठान, यज्ञ-यागादि हुए। प्राचीन संस्कारों को जीवन्त बनाए रखने तथा वैदिक संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन के प्रयास उनके जीवन-उद्देश्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं जिसे मृत्यु पर्यन्त उन्होंने समग्र ऊँचाइयों के साथ निभाया।
नई पीढ़ी को प्राचीन ज्ञानराशि एवं क्रियाओं की वैज्ञानिकता व शाश्वतता भरे महत्व से अवगत कराकर इनके प्रति रुचि बढ़ाए जाने के लिए पिछले दो दशक में ग्रीष्मावकाश में उनके द्वारा २४ शिविर आयोजित किए गए। इन शिविरों में विधि-विधान के साथ सामूहिक उपनयन संस्कार आयोजित कर मितव्ययता का संदेश भी दिया। इनमें पौरोहित्य, ज्योतिष, कर्मकांड, संस्कृत, सामुद्रिक रहस्य, तंत्र-मंत्र, योग आदि विषयों का आरंभिक शिक्षण एवं प्रशिक्षण दिया गया। अनेक बार राजस्थान संस्कृत अकादमी ने इन शिविरों को मान्यता देते हुए आर्थिक सहयोग प्रदान किया है।
उनकी ही प्रेरणा सुफल है कि सन् १९८२ में बांसवाड़ा में वनेश्वर शिवालय परिसर में स्व. उमाशंकर पाठक की स्मृति में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सरस्वती देवी ने गायत्री मंदिर बनवाया। इसमें गायत्री देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठा हुई। इसी प्रतिष्ठा समारोह में गणमान्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा गायत्री मंडल की स्थापना हुई, जिसमें सर्वसम्मति से पं. महादेव शुक्ल को अध्यक्ष चुना गया। राज्य सरकार से वनेश्वर महादेव परिसर में दक्षिण तरफ गायत्री मंदिर के दक्षिण तरफ पड़त जमीन सरकार से खरीद कर जन सहयोग से परकोटा एवं ३ कमरे मय बरामदे के बनवाये। विद्युत एवं जल साधन आदि की व्यवस्था करवाई।
प्राच्यविद्याओं के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण के लिए उन्होंने विधिवत रूप से २५ फरवरी १९८२ को गायत्री मंडल की स्थापना की व इसका पंजीकरण कराया। इसका उद्देश्य वैदिक संस्कृति, संस्कारों, साधना पद्धतियों का प्रचार-प्रसार एवं नई पीढ़ी को दुर्लभ ज्ञानराशि से अवगत करा कर रचनात्मक गतिविधियों का प्रोत्साहन एवं संचालन है।
गायत्री मंडल की रचनात्मक गतिविधियों में उत्तरोत्तर वृद्धि के चलते वे स्थापना से लेकर वर्षों तक इसके निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाते रहे। कर्मकांड, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, अध्यात्म आदि विषयों पर शताधिक कार्यक्रम, संगोष्ठियां, चर्चाएं आदि उन्होंने संपादित करवायी। सन् १९८५ में राजस्थान संस्कृत अकादमी के तत्वावधान में वेद विद्यालय प्रारंभ करवाया तथा बालिका संस्कृत पाठशाला, संस्कृत निदेशालय से भी प्रारंभ करवाया। पहले बैच में ६ छात्र शुक्ल यजुर्वेद पढ़ने हेतु प्रविष्ट हुए। वेद अध्यापन कार्य पं. शुक्ल ने ही किया।
सन् १९८६ में राजस्थान संस्कृत अकादमी एवं गायत्री मंडल के संयुक्त तत्वावधान में २१ दिवसीय पौरोहित्य प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया। उद्घाटन के अवसर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी एवं डॉ. मंडन मिश्र तथा डॉ. पट्टाभिराम शास्त्री भी शामिल हुए थे। इस शिविर में बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर व प्रतापगढ़ आदि इलाकों प्रशिक्षणार्थी उपस्थित हुवे, जिसकी संख्या ९० थी। प्रतापगढ़ से आने वाले श्रीहरि शुक्ल ने यजुर्वेद पूर्ण पढ़ा जो अभी वर्तमान में अपने स्तर पर श्री केशवराय मन्दिर, प्रतापगढ़ में वेद पाठशाला चला रहे हैं। सन् १९८७ में राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा वेदाध्यापक साकेत बिहारी, वेदाचार्य निवासी रीवां, ग्वालियर की नियुक्ति की जिन्होंने २ साल तक वेदाध्यापन कराया व अन्यत्र राजकीय विद्यालय में नियुक्ति हो जाने से चले गये। इसके बाद काफी समय तक पं. शुक्ल ने ही बांसवाड़ा के वेद विद्यालय का संचालन किया।
पं. शुक्ल ने सन् १९८८ व १९९० में त्रिपुरा सुन्दरी तीर्थ पर, तथा १९८९ में बांसवाड़ा में कर्मकाण्ड व ज्योतिष शिक्षण शिविर लगाया। शिविर समापन के अवसर पर उदयपुर, मेवाड़ महामण्डलेश्वर महंत मुरलीमनोहरशरण शास्त्री एवं श्रीरामबोला मठ, डूंगरपुर के महामण्डलेश्वर श्री केशवदास जी महाराज सहित अनेक संत-महात्माओं और महन्तों का सान्निध्य प्राप्त होता रहा।
इन शिविरों के माध्यम से अब तक एक हजार से अधिक प्रशिक्षणार्थी कर्मकाण्ड, ज्योतिष आदि का प्रारंभिक प्रशिक्षण पा चुके हैं। इनमें से अधिकांश युवाओं ने इन विधाओं को अपने रोजगार का माध्यम बनाया हुआ है। इनके साथ ही पीताम्बरा, श्रीविद्या आदि गुह्य साधनाओं के प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन भी हुआ है।
सन् २००२ में राजस्थान संस्कृत अकादमी एवं गायत्री मंडल के संयुक्त तत्वावधान में बांसवाड़ा में आपके निर्देशन में वेद वेदांग सम्मेलन सम्पन्न हुआ। जिसका उद्घाटन राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल न्यायमूर्ति श्री अंशुमानसिंह ने किया। इसमें हिन्दुस्तान के विद्वानों के साथ ही नेपाल से भी वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
केन्द्रीय संस्कृत अकादमी, शंकर विद्या केन्द्र, राजस्थान संस्कृत अकादमी, वेद विद्या प्रतिष्ठान, सांदीपनि वेद विद्या संस्थान आदि संस्थाओं द्वारा आयोजित होने वाले वैदिक शिविरों में संभागी एवं वार्ताकार के रूप में आपने हिस्सा लिया।
राज्य सरकार द्वारा यहां वनेश्वर मन्दिर के पास उपलब्ध कराई गई ३ बीघा ६ बिस्वा भूमि पर साधना कक्ष बने हुए हैं। उनके निर्देशन में वेद विद्यालय व राजकीय संस्कृत पाठशाला भी चली। पं. शुक्ल की इच्छा थी कि इस परिसर में सत्संग कक्ष, पीताम्बरा शक्तिपीठ परिसर आदि की स्थापना हो। राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा यहां स्थापित वेद विद्यालय से कई छात्रों ने सस्वर वेद ज्ञान लिया है।
मण्डल की कई संस्थाएं विविध क्षेत्रों में चल रही हैं। अखिल भारतीय एवं प्रदेशस्तरीय वेद सम्मेलनों, उपनिषदों तथा विविध आयोजनों में वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए उन्हें अनेक अवसरों पर सम्मानित किया गया है। दुर्लभ ज्ञानराशि के जानकार एवं आधिकारिक विद्वान होते हुए भी पुरस्कारों एवं सम्मान की कामना से परे रहकर वे काम करते रहे। उनके नेतृत्व में गायत्री मण्डल ने दक्षिणांचल में वेद, ज्योतिष, कर्मकाण्ड और साधना प्रशिक्षण तथा प्रचार-प्रसार की प्रमुख संस्था के रूप में ख्याति प्राप्त की है।
वागड़ क्षेत्र की प्राचीन पूजा पद्धतियों के संरक्षण तथा नई पीढ़ी में सरल एवं सुबोधगम्य संवहन के लिए व्यापक कार्य किए हैं। उनके प्रयासों से ही गायत्री मण्डल का छोटा-सा पुस्तकालय संचालित हो रहा है, जिसके लिए पं. पन्नालाल जोशी की पुस्तकें भी जोशी परिवार द्वारा प्रदान की गई हैं। इस पुस्तकालय की स्थापना में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी सहयोग प्रदान किया है।
महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान के तत्वावधान में १२ अगस्त २००० को उज्जैन में आयोजित समारोह में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरलीमनोहर जोशी ने अखिल भारतीय वैदिक सम्मान समारोह में पं. शुक्ल को १० हजार रुपए प्रदान कर एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।
राजस्थान संस्कृत अकादमी, जयपुर द्वारा सन् २००२ में पं. महादेव शुक्ल को पं. वीरेश्वर शास्त्री पौरोहित्य सम्मान प्रदान किया गया। इसी प्रकार महाराणा मेवाड फाउन्डेशन, उदयपुर द्वारा राष्ट्रीय परिवेश में वैदिक संस्कृति, पुराण तथा कर्मकाण्ड के क्षेत्र में जनचेतनार्थ सम्पादित स्थायी मूल्यों की सेवाओं के उपलक्ष्य में ९ मार्च २००३ को उदयपुर में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में हारीत राशि सम्मान से अलंकृत किया गया है। राजस्थान संस्कृत अकादमी तथा श्रीनाथद्वारा मन्दिर मण्डल के संयुक्त तत्वावधान में विक्रम संवत २०४८ में नाथद्वारा में आयोजित त्रि दिवसीय अखिल भारतीय वैदिक सम्मेलन में भी आपको सम्मानित किया गया।
महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन तथा निम्बार्क संस्थान, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में २४ से २६ फरवरी २००२ (संवत् २०५८) में उदयपुर में आयोजित त्रि-दिवसीय क्षेत्रीय वैदिक सम्मेलन में उन्हें मेवाड़ महामण्डलेश्वर महन्त मुरलीमनोहरशरण शास्त्री द्वारा ''वेद मार्त्तण्ड'' उपाधि से सम्मानित किया गया। इसके अलावा संस्कृत एवं वेद संस्थानों तथा अकादमियों के निमंत्रण पर प्रदेश एवं देश के विभिन्न हिस्सों में वेद सम्मेलनों, ज्योतिष संगोष्ठियों और पौरोहित्य गतिविधियों में आपकी भागीदारी रही।
बाँसवाड़ा एवं डूंगरपुर जिलों के ब्राह्मण समुदाय के संगठन वागड़ प्रान्तीय औदीच्य ब्राह्मण समाज के सम्मेलन में ब्राह्मण समाज की ओर से पं. शुक्ल को श्री महामण्डलेश्वर महंत केशवदासजी महाराज द्वारा ब्रह्मर्षि की उपाधि दी गई। श्रीरामबोला मठ, डूँगरपुर के महामण्डलेश्वर केशवदासजी महाराज ने २००३ में डूंगरपुर में आयोजित समारोह में अभिनंदन पत्र भेटकर उन्हें सम्मानित किया। इसी प्रकार अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा उदयपुर सहित अनेक संस्थाओं द्वारा आपका अभिनन्दन किया गया।
पं. महादेव शुक्ल ने त्रिपुरा सुन्दरी तीर्थ में २१ से २३ मार्च, २००६ को इन्दिरा गांधी कला कोष, नई दिल्ली एवं गायत्री मंडल के संयुक्त तत्वावधान में क्षेत्रीय वेद सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न करवाया।
निष्काम कर्मयोगी पं. महादेव शुक्ल समाज-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग हमेश प्रदान किया। बात चाहे समाज सेवा, सांस्कृतिक परम्पराओं के रक्षण या संवर्धन की हो अथवा धार्मिक चेतना के लिए संघर्ष की, नई पीढ़ी को साथ लेकर आगे चलने एवं प्रोत्साहन की परम्परा को निभाते हुए काम करने की उनकी विशिष्टता हर कर्म में परिलक्षित होती थी।
वर्ष २००८ में प्राचीन और प्रसिद्ध लालीवाव मठ में आयोजित महन्त नारायणदास स्मृति समारोह में लालीवाव पीठाधीश्वर महन्त हरिओमशरणदास महाराज तथा अन्य संत-महात्माओं और धर्म-अध्यात्म जगत के विद्वानों की ओर से पं. महादेव शुक्ल को देवर्षि की उपाधि से विभूषित किया गया।
किसी भी प्रकार की धार्मिक और आध्यात्मिक जिज्ञासा का समाधान पाने के लिए पं. शुक्ल से उनके दूरभाष नम्बर पर सम्पर्क कर हर कोई जिज्ञासुजन अपनी जिज्ञासा शांत होने का सुकून प्राप्त कर आनंद की अनुभूति करता था।
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल को फरवरी के अंतिम सप्ताह में तबीयत खराब होने पर बांसवाड़ा के एमजी अस्पताल में भरती कराया गया। इसके बाद उन्हें एमबी अस्पताल उदयपुर ले जाया गया जहां फाल्गुन शुक्ल बुधाष्टमी ४ मार्च की रात सवा ग्यारह बजे उन्होंने अंतिम साँस ली।
सादगीपूर्ण जीवन के पर्याय, शुचिता की प्रतिमूर्ति और, पीताम्बरा मां के अनन्य उपासक पं. महादेव शुक्ल के व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व की लहरों के साथ ही दृष्टिगोचर होता था कि उनके भीतर ज्ञान का विराट सागर भावों की लहरों के साथ निरन्तर उमड़ रहा है। लौकिक कामनाओं से परे पं. शुक्ल के जीवन का ध्येय यही था -न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नाऽपि पुनर्भवम्। कामये दुःख तप्तानाम् प्राणिनाम्आर्तिनाशनम्॥
देवर्षि पं. महादेव शुक्ल यद्यपि अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन प्राच्य संस्कृति के संरक्षण-संवर्द्धन के क्षेत्र में उन्होंने शिष्यों की जो फसल तैयार की है उसके जरिये वे लोक जीवन में अमर हो गए हैं।
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देश भर में अपनी प्रतिभा की धाक जमाने वाले देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के निधन पर वागड़ अंचल की विभिन्न संस्थाओं और संगठनों ने भावभीनी श्रद्धान्जलि अर्पित की है और कहा है कि उनके महाप्रयाण से क्षेत्र में धर्म-संस्कृति और अध्यात्म जगत का दैदीप्यमान नक्षत्र खो दिया है।
श्रीमद भागवत समिति एवं गणेश भक्त मण्डल के तत्वावधान में शहर के प्रसिद्ध सिद्धि विनायक
गणपति मन्दिर में प्रख्यात प्राच्यविद्यामर्मज्ञ देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के प्रति श्रद्धान्जलि अर्पित करने श्रद्धान्जलि सभा आयोजित हुई।
इसमें उपस्थित प्रबुद्धजनों ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वेदों के प्रचार में अपना सर्वस्व अर्पित कर देने वाले देवर्षि पं. महादेव शुक्ल समाज के लिए प्रेरणा पुंज थे। प्राच्यविद्याओं के माध्यम से उन्होंने समाज और परिवेश को नई दिशा देने का कार्य किया जिससे सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक जगत से जुड़ी संस्थाएं और व्यक्ति लाभान्वित हुए।
सभा की अध्यक्षता करते हुए समिति के अध्यक्ष श्री शंकरलाल दोसी ने कहा कि देवर्षि पं. शुक्ल उद्भट विद्वान थे जिन्हें देश भर में सम्मान और आदर से याद किया जाता रहा है। ऎसे गौरवपूर्ण व्यक्तित्व का महाप्रयाण अत्यन्त दुःखद है।
शिक्षाविद् श्री मनोहरलाल चौबीसा ने कहा कि पं. शुक्ल ने वेद, अध्यात्म, कर्मकाण्ड तथा संस्कृत जगत की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया। इन क्षेत्रों में उन्होंने नई पीढ़ी को तैयार कर अमूल्य योगदान दिया है।
श्रीमद् भागवत समिति के सचिव श्री रवीन्द्र मेहता ने कहा कि पं. शुक्ल के जाने से लोढ़ी काशी ने प्रकाण्ड विद्वान खो दिया है। इस रिक्तता से समूचा क्षेत्रा सूना-सूना हो गया है।
श्री सुरेश गुप्ता एवं श्री सत्यनारायण शाह ने पं. शुक्ल को प्रेरणा स्त्रोत बताते हुए संकट की घड़ी और हर धार्मिक-आध्यात्मिक समस्या से सहजता से उबार देने वाला व्यक्तित्व निरूपित किया।
श्री गणेश भक्त मण्डल के अध्यक्ष दीपक द्विवेदी ने कहा कि पं. शुक्ल के बताए मार्ग पर चलकर हम नई पीढ़ी को संस्कारवान बनायें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धान्जलि होगी।
श्रद्धान्जलि सभा में तन्म्य नागर, राधाकृष्ण खन्ना, नटवरलाल सागवाड़िया, मदन मेहता, अशोक मेहता, हीरा भाई, कन्हैया भाई, अजय त्रिवेदी, देवेन्द्र शाह सहित उपस्थित सैकड़ों भक्तों ने देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए।अन्त में दो मिनट का मौन रखकर दिव्यात्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई।
पीताम्बरा परिषद ने दी श्रद्धान्जल
कर्मकाण्ड और ज्योतिष तथा तंत्र-मंत्र विधाओं के क्षेत्र में प्रसिद्ध वैदिक विद्वान देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के ब्रह्मलीन होने पर पीताम्बरा परिषद की ओर से गुरुवार शाम गायत्री मण्डल परिसर में श्रद्धान्जलि सभा का आयोजन परिषद के संयोजक दिनेशचन्द्र भट्ट की अध्यक्षता में हुआ। इसमें परिषद के संरक्षक तथा गायत्री मण्डल के संस्थापक रहे देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के महाप्रयाण पर गहरा शोक व्यक्त किया गया और परिषद की ओर से भावपूर्ण श्रद्धान्जलि अर्पित की गई।
इस अवसर पर देवर्षि पं. शुक्ल द्वारा वैदिक ज्ञान-विज्ञान के प्रचार-प्रसार, ज्योतिर्ष, कर्मकाण्ड और पौरोहित्य विधाओं के बारे में नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने की ढाई दशक से विद्यमान परम्परा और प्राच्यविद्याओं के संरक्षण एवं संवद्र्धन के क्षेत्र में दशकों तक की गई उनकी अनथक सेवाओं के साथ ही सर्वस्पर्शी एवं माधुर्यपूर्ण व्यक्तित्व का स्मरण किया गया।
परिषद के संयोजक दिनेश भट्ट ने इस अवसर पर कहा कि बगलामुखी साधना के बारे में साधकों और दीक्षा और प्रशिक्षण का समूचा श्रेय देवर्षि पं. महादेव शुक्ल को जाता है जिन्होंने पीताम्बरा परिषद का गठन कर क्षेत्र भर में बगलामुखी साधकों का व्यापक नेटवर्क तैयार किया।
उन्होंने कहा कि पं. शुक्ल की इच्छा के अनुरूप बांसवाड़ा में बगलामुखी शक्तिपीठ की स्थापना, वृद्धाश्रम, गौशाला तथा तंत्र-मंत्र-यंत्र एवं ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र की स्थापना के लिए हरसंभव प्रयास किए जाएंगे। इस अवसर पर पं. राजेश त्रिवेदी, पं. विनय भट्ट, पं. नरेन्द्र आचार्य, पं. चन्द्रकान्त मेहता, पं. प्रदीप शुक्ला, पं. कन्हैयालाल जोशी, पं. दीपक द्विवेदी, पं. विद्यासागर शुक्ल, पं. देवेन्द्र शुक्ल, श्रीमती कल्पना, पं. गिरीश महाराज, पं. अमित जोशी, पं. नरेन्द्र चौबीसा ‘‘मामाजी’’, पं. विजय कुमार त्रिवेदी ‘‘बंटू महाराज’’ सहित पीताम्बरा साधकों ने पं. शुक्ल की तस्वीर पर पुष्पान्जलि अर्पित की। इस अवसर पर पीताम्बरार्चन महानुष्ठान किया गया और देवर्षि की दिव्यात्मा को शांति प्रदान करने की प्रार्थना की गई
इसमें उपस्थित प्रबुद्धजनों ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वेदों के प्रचार में अपना सर्वस्व अर्पित कर देने वाले देवर्षि पं. महादेव शुक्ल समाज के लिए प्रेरणा पुंज थे। प्राच्यविद्याओं के माध्यम से उन्होंने समाज और परिवेश को नई दिशा देने का कार्य किया जिससे सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक जगत से जुड़ी संस्थाएं और व्यक्ति लाभान्वित हुए।
सभा की अध्यक्षता करते हुए समिति के अध्यक्ष श्री शंकरलाल दोसी ने कहा कि देवर्षि पं. शुक्ल उद्भट विद्वान थे जिन्हें देश भर में सम्मान और आदर से याद किया जाता रहा है। ऎसे गौरवपूर्ण व्यक्तित्व का महाप्रयाण अत्यन्त दुःखद है।
शिक्षाविद् श्री मनोहरलाल चौबीसा ने कहा कि पं. शुक्ल ने वेद, अध्यात्म, कर्मकाण्ड तथा संस्कृत जगत की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया। इन क्षेत्रों में उन्होंने नई पीढ़ी को तैयार कर अमूल्य योगदान दिया है।
श्रीमद् भागवत समिति के सचिव श्री रवीन्द्र मेहता ने कहा कि पं. शुक्ल के जाने से लोढ़ी काशी ने प्रकाण्ड विद्वान खो दिया है। इस रिक्तता से समूचा क्षेत्रा सूना-सूना हो गया है।
श्री सुरेश गुप्ता एवं श्री सत्यनारायण शाह ने पं. शुक्ल को प्रेरणा स्त्रोत बताते हुए संकट की घड़ी और हर धार्मिक-आध्यात्मिक समस्या से सहजता से उबार देने वाला व्यक्तित्व निरूपित किया।
श्री गणेश भक्त मण्डल के अध्यक्ष दीपक द्विवेदी ने कहा कि पं. शुक्ल के बताए मार्ग पर चलकर हम नई पीढ़ी को संस्कारवान बनायें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धान्जलि होगी।
श्रद्धान्जलि सभा में तन्म्य नागर, राधाकृष्ण खन्ना, नटवरलाल सागवाड़िया, मदन मेहता, अशोक मेहता, हीरा भाई, कन्हैया भाई, अजय त्रिवेदी, देवेन्द्र शाह सहित उपस्थित सैकड़ों भक्तों ने देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए।अन्त में दो मिनट का मौन रखकर दिव्यात्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई।
पीताम्बरा परिषद ने दी श्रद्धान्जल
कर्मकाण्ड और ज्योतिष तथा तंत्र-मंत्र विधाओं के क्षेत्र में प्रसिद्ध वैदिक विद्वान देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के ब्रह्मलीन होने पर पीताम्बरा परिषद की ओर से गुरुवार शाम गायत्री मण्डल परिसर में श्रद्धान्जलि सभा का आयोजन परिषद के संयोजक दिनेशचन्द्र भट्ट की अध्यक्षता में हुआ। इसमें परिषद के संरक्षक तथा गायत्री मण्डल के संस्थापक रहे देवर्षि पं. महादेव शुक्ल के महाप्रयाण पर गहरा शोक व्यक्त किया गया और परिषद की ओर से भावपूर्ण श्रद्धान्जलि अर्पित की गई।
इस अवसर पर देवर्षि पं. शुक्ल द्वारा वैदिक ज्ञान-विज्ञान के प्रचार-प्रसार, ज्योतिर्ष, कर्मकाण्ड और पौरोहित्य विधाओं के बारे में नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने की ढाई दशक से विद्यमान परम्परा और प्राच्यविद्याओं के संरक्षण एवं संवद्र्धन के क्षेत्र में दशकों तक की गई उनकी अनथक सेवाओं के साथ ही सर्वस्पर्शी एवं माधुर्यपूर्ण व्यक्तित्व का स्मरण किया गया।
परिषद के संयोजक दिनेश भट्ट ने इस अवसर पर कहा कि बगलामुखी साधना के बारे में साधकों और दीक्षा और प्रशिक्षण का समूचा श्रेय देवर्षि पं. महादेव शुक्ल को जाता है जिन्होंने पीताम्बरा परिषद का गठन कर क्षेत्र भर में बगलामुखी साधकों का व्यापक नेटवर्क तैयार किया।
उन्होंने कहा कि पं. शुक्ल की इच्छा के अनुरूप बांसवाड़ा में बगलामुखी शक्तिपीठ की स्थापना, वृद्धाश्रम, गौशाला तथा तंत्र-मंत्र-यंत्र एवं ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र की स्थापना के लिए हरसंभव प्रयास किए जाएंगे। इस अवसर पर पं. राजेश त्रिवेदी, पं. विनय भट्ट, पं. नरेन्द्र आचार्य, पं. चन्द्रकान्त मेहता, पं. प्रदीप शुक्ला, पं. कन्हैयालाल जोशी, पं. दीपक द्विवेदी, पं. विद्यासागर शुक्ल, पं. देवेन्द्र शुक्ल, श्रीमती कल्पना, पं. गिरीश महाराज, पं. अमित जोशी, पं. नरेन्द्र चौबीसा ‘‘मामाजी’’, पं. विजय कुमार त्रिवेदी ‘‘बंटू महाराज’’ सहित पीताम्बरा साधकों ने पं. शुक्ल की तस्वीर पर पुष्पान्जलि अर्पित की। इस अवसर पर पीताम्बरार्चन महानुष्ठान किया गया और देवर्षि की दिव्यात्मा को शांति प्रदान करने की प्रार्थना की गई

Namaskar,
ReplyDeleteWith the ashirwad and shubh-iccha of all my fellow Bharatiya, have commenced research work on Bhagwan Sri Parshuram, any mind who knows what ever little or more about Bhagwan Sri Vishnu’s 6th Avatar; please pour the nectar in my mind too, as I wish not to miss any element of his, let us all bear in mind; that the 10th Avatar of Bhagwan Sri Vishnu “Sri Kalki” will gain all its martial wisdom from nun-other than Bhagwan Sri Parshuram.
The English word Mythology is actually taking our youngsters away from “WISDOM” thus though they pray to our gods Bhagwan Sri Ram or Bhagwan Sri Krishna, they also are conditioned to say that it is mythological, the word coined from the Sanskrit word “Mithya”.
My search for minds to connect to the energy that is theoretically taken or going to take birth, this research shall be the platform for all of us to come under his “Energies”.
II Krishnam vande jagat guram II
Dhanyawaad,
Samjay S. Devkar
sdevkar@gmail.com